भारत में वर्ष 2025 में 65 इंटरनेट शटडाउन दर्ज

पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था और शासन

संदर्भ

  • एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने वर्ष 2025 में 65 इंटरनेट शटडाउन लागू कीं, जो 2017 के बाद से देश में दर्ज की गई सबसे कम संख्या है।
    • वैश्विक स्तर पर, एशिया-प्रशांत क्षेत्र ने इन व्यवधानों का अधिकांश हिस्सा दर्ज किया, जहाँ 11 देशों में कुल 195 शटडाउन लागू की गईं।

इंटरनेट शटडाउन से संबंधित विधिक प्रावधान

  • आधार: भारतीय राज्य और केंद्र शासित प्रदेश केवल “सार्वजनिक आपातकाल” या “सार्वजनिक सुरक्षा” के हित में ही इंटरनेट शटडाउन लागू कर सकते हैं, जैसा कि भारतीय टेलीग्राफ अधिनियम में प्रावधान है।
    • तथापि, कानून यह परिभाषित नहीं करता कि आपातकाल या सुरक्षा मुद्दा किसे कहा जाएगा।
  • वर्ष 2017 तक, शटडाउन मुख्यतः दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 144 के अंतर्गत लागू की जाती थी।
    • धारा 144 पुलिस और जिला मजिस्ट्रेट को अवैध जमावड़े को रोकने तथा किसी व्यक्ति को किसी गतिविधि से विरत रहने का निर्देश देने का अधिकार देती है।
  • 2017 में कानून में संशोधन कर सरकार ने दूरसंचार सेवाओं का अस्थायी निलंबन (सार्वजनिक आपातकाल या सार्वजनिक सुरक्षा) नियम, 2017 अधिसूचित किया।
    • इन नियमों में इंटरनेट सेवाओं को अस्थायी रूप से निलंबित करने की प्रक्रिया और शर्तें निर्धारित की गईं।
    • आदेशों की वैधता सुनिश्चित करने हेतु इन्हें 5 दिनों के अंदर एक परामर्श बोर्ड द्वारा समीक्षा करना आवश्यक है।

अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ मामला

  • वर्ष 2020 में सर्वोच्च न्यायालय ने जम्मू और कश्मीर में इंटरनेट शटडाउन पर निर्णय देते हुए कहा कि राज्य द्वारा अनिश्चितकालीन इंटरनेट शटडाउन भारतीय संविधान के अंतर्गत अनुमेय नहीं है।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने आगे कहा कि धारा 144 का प्रयोग वास्तविक विरोध को रोकने के साधन के रूप में नहीं किया जा सकता, क्योंकि संविधान के अंतर्गत विरोध का अधिकार मान्य है।
    • धारा 144 के बहुत विशिष्ट मानदंड हैं, और केवल उन्हीं के संतुष्ट होने पर मजिस्ट्रेट आदेश पारित कर सकता है।
  • आदेशों की प्रमुख विशेषताएँ:
  • इंटरनेट का उपयोग भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 के अंतर्गत मौलिक अधिकार है।
  • इंटरनेट शटडाउन अस्थायी अवधि के लिए हो सकती है, परंतु अनिश्चितकालीन नहीं।
  • सरकार को धारा 144 के अंतर्गत लगाए गए सभी आदेश प्रकाशित करने होंगे।
  • न्यायालय ने यह भी कहा कि इंटरनेट शटडाउन से संबंधित कोई भी आदेश न्यायिक समीक्षा के अधीन होगा।

सरकार द्वारा इंटरनेट शटडाउन के पक्ष में तर्क

  • राष्ट्रीय सुरक्षा: सरकार इंटरनेट सेवाओं को अस्थायी और लक्षित उपाय के रूप में निलंबित करती है ताकि गलत सूचना के प्रसार, अवैध गतिविधियों के समन्वय या सुरक्षा खतरों को रोका जा सके।
  • अस्थायी और लक्षित उपाय: ये उपाय दीर्घकालिक पहुँच को बाधित करने के लिए नहीं, बल्कि विशिष्ट और तात्कालिक चिंताओं को संबोधित करने के लिए होते हैं।
  • अशांति और हिंसा की रोकथाम: ऑनलाइन संचार को निलंबित करने से विरोध, दंगे या अन्य प्रकार की अशांति को संगठित होने से रोका जा सकता है।
  • फर्जी समाचार और भ्रामक सूचना का प्रतिकार: संकट या संघर्ष के समय ऑनलाइन प्रसारित गलत सूचना तनाव को बढ़ा सकती है और भ्रम फैला सकती है।

सरकार द्वारा इंटरनेट शटडाउन के विरुद्ध तर्क

  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रभाव: इंटरनेट शटडाउन भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन करती है।
  • वैश्विक छवि और निवेश: बार-बार की जाने वाली इंटरनेट शटडाउन भारत की वैश्विक छवि को प्रभावित करती है और निवेशकों व अंतर्राष्ट्रीय साझेदारों में चिंता उत्पन्न करती है।
  • मानवाधिकार चिंताएँ: इंटरनेट शटडाउन सूचना तक पहुँच, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सभा के अधिकार जैसे मानवाधिकारों पर प्रश्न उठाती है।
  • आर्थिक व्यवधान: भारत की तीव्र गति से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था इंटरनेट शटडाउन से गंभीर आर्थिक हानि का सामना कर सकती है।
  • शैक्षिक चुनौतियाँ: शिक्षा में ऑनलाइन प्लेटफार्मों के बढ़ते उपयोग के कारण इंटरनेट शटडाउन छात्रों की अध्ययन सामग्री तक पहुँच को गंभीर रूप से प्रभावित करती है।

निष्कर्ष

  • इंटरनेट बंदी सार्वजनिक आपातकाल की असाधारण परिस्थितियों में उचित हो सकती है, परंतु इसका बार-बार और अपारदर्शी प्रयोग मौलिक अधिकारों, आर्थिक विकास एवं लोकतांत्रिक शासन के लिए चिंता उत्पन्न करता है।
  • कानूनी सुरक्षा उपायों, पारदर्शिता, तकनीकी विकल्पों और जवाबदेही का संतुलित दृष्टिकोण आवश्यक है ताकि इंटरनेट बंदी दुर्लभ, अनुपातिक एवं संवैधानिक रूप से वैध बनी रहे।

स्रोत: IE

 

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